Thursday, April 29, 2021

शव, संवेदना और कोरोना


घृणा और संवेदना भावावली के भिन्न छोर हैं। आपके कथन, उपकथन, वाक्य, तर्क, प्रश्न या उत्तर में यदि यह दोनों ही भाव एक साथ आ रहे हैं तो आप नौटंकी कर रहे हैं। न तो आपकी घृणा शुद्ध है, न ही संवेदना। 'सम्+वेदना' यानी दूसरे के वेदना की समान अनुभूति। जब आप दूसरों की वेदना साझा कर रहे हैं, तो ऐसे में आप अगले चुनाव में किसकी सरकार गिरानी है, किसको लाना है आदि बातें कैसे कर सकते हैं? 


आपको सरकारों को कोसना है तो उसके लिए आपको लाश क्यों चाहिए? जलती चिताओं की तस्वीर किसी सरकार को कोसने के लिए कैसे आवश्यक है? क्या उसमें आपका कोई परिजन है? अगर हाँ, तो आप कितने हृदयविहीन हैं कि आप अपने परिवार के सदस्य की मृत्यु के समय भी उसके साथ न हो कर मस्तिष्क में यह योजना बना रहे हैं कि 'इसे पोस्ट कर के सरकार गिरा दूँगा'। और, अगर नहीं, तो फिर आपकी समस्या क्या है? क्या आप मानसिक विक्षिप्त हैं जो दूसरों के शवों के सहारे अपनी कुंठा का वमन कर रहे हैं?


क्या मृतात्मा को निजता का अधिकार नहीं? क्या शवों के अंतिम संस्कार के समय हम लाइव करते हैं, वहाँ खड़े हो कर तस्वीर लेते हैं? क्या आपके परिजन की अंत्येष्टि ही एक साक्ष्य है लचर व्यवस्था की? क्या श्मशानों के बाहर श्वेत शवावरण में लिपटे, पुष्पों से अंतिम प्रणाम में लिपटे शव किसी राजनैतिक कहानी का हिस्सा बनने के लिए हैं? 


ऐसे समय में जब महामारी है, और हमारी जनसंख्या अत्यधिक है, हमारी व्यवस्था विश्व के उच्चतम मानदंडों से कहीं नीचे है, ऐसे में क्या श्मशानों के बाहर शवों की पंक्तियाँ नहीं दिखेंगी? क्या एक साथ तीस चिताएँ नहीं धधकेंगी? अमेरिका, इटली, फ्रांस, इंग्लैंड आदि में क्रमशः प्रति दस लाख व्यक्ति 1769, 1991, 1589, 1870 मृत्यु का औसत है। कभी दिखी सोशल मीडिया पर कॉफिन और कब्रों की तस्वीरें? 


विश्व का औसत कितना है पता है? प्रति दस लाख व्यक्ति 405.9 मृत्यु। भारत कहाँ है, ये मालूम है? 147 मृत्यु प्रति दस लाख व्यक्ति। भारत विश्व में 118वें स्थान पर है इस आँकड़े के हिसाब से, विश्व के औसत का भी सिर्फ एक-तिहाई है। यूरोप-अमेरिका समेत, जिसमें फिनलैंड और नॉर्वे जैसे राष्ट्र भी शामिल हैं, या तो भारत से बदतर हालत में हैं, या समकक्ष। वहाँ तो मोदी या योगी सरकार नहीं चला रहा है, वहाँ तो गोरे लोग हैं, पैसे वाले, रेनेसॉ से धरती पर विज्ञान लाने वाले, वहाँ इतनी खराब स्थिति क्यों है? वहाँ तो स्कूल के फुटबॉल मैदान में पैर टूटने पर एयर एम्बुलेंस आती है, वहाँ भारत से ज्यादा शव क्यों गिरे? 


फिर भी, फेसबुक पर कॉफिन के साथ सरकार को कोसती मीडिया या लोग क्यों नहीं मिलते? शायद वो शवों को सीढ़ी नहीं बनाना चाहते। आपकी राजनैतिक घृणा या अपनी मूर्खता इतनी अधिक हो गई है कि आपको शवों की तस्वीरें शेयर करना सामान्य लगने लगा है। 


पैनिक मत बाँटिए, संवेदना दिखाइए और सहायता कर सकते हैं तो कीजिए। झूठी उम्मीद मत दीजिए। दो प्रश्न पूछ रहा हूँ, स्वयं को ही उत्तर दे दीजिएगा। राज्य सरकारों की असफलता नापने का आपका पैमाना क्या है, किस राज्य को मॉडल के तौर पर देख रहे हैं? भारत सरकार के नकारेपन को विश्व की किस सरकार के सामने रख कर तौल रहे हैं? भारत की जनसंख्या और जीडीपी, स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे चर कारकों को भी ध्यान में रखिएगा। 


और हाँ, शवों की तस्वीर लगाना बंद कीजिए।

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