Friday, December 28, 2018

बिहार का मशहूर सिलाव खाजा

बिहार में मिलने वाले मिष्ठान सिलाव खाजा को हाल ही में भौगोलिक संकेत (GI) दिया गया है. बिहार की यह पारंपरिक मिठाई इस क्षेत्र की विशिष्टता को दर्शाने में अहम भूमिका निभाएगी. जीआई डिप्टी रजिस्ट्रार जी. नायडू ने इस व्यंजन जीआई टैग मिलने की घोषणा की.

माना जाता है कि सिलाव खाजा की शुरुआत उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले तथा बिहार के पश्चिमी जिलों से हुई. इसका निर्माण गेहूं के आटे, मैदा, चीनी तथा इलायची इत्यादि से किया जाता है. वर्तमान में यह व्यंजन बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल तथा आंध्र प्रदेश इत्यादि में काफी लोकप्रिय है. इससे पहले बिहार की शाही लीची को भी जीआई टैग प्रदान किया गया था.



सिलाव खाजा

बिहार स्थित राजगीर और नालंदा के बीच स्थित सिलाव नामक स्थान है. इस स्थान पर खाजा की मिठाई बेहद प्रसिद्ध है इसलिए इस मिठाई को सिलाव खाजा के नाम से जाना जाता है.
यहां का खाजा बेहद खास होता है जिसे 52 परतों में बनाया जाता है.
यह मिठाई दिखने में पैटीज़ जैसी होती है लेकिन स्वाद में मीठी होती है.
इसके लिए आटे, मैदा, चीनी तथा इलायची का प्रयोग किया जाता है.
यह सिलाव खाजा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पर्यटन कार्यक्रमों में अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहा है.



भौगोलिक संकेत (जीआई टैग)

 •    जीआई टैग अथवा भौगोलिक चिन्ह किसी भी उत्पाद के लिए एक चिन्ह होता है जो उसकी विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष गुणवत्ता और पहचान के लिए दिया जाता है और यह सिर्फ उसकी उत्पत्ति के आधार पर होता है.

•    ऐसा नाम उस उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है.

•    दार्जिलिंग चाय, महाबलेश्वर स्ट्रोबैरी, जयपुर की ब्लूपोटेरी, बनारसी साड़ी और तिरूपति के लड्डू कुछ ऐसे उदाहरण है जिन्हें जीआई टैग मिला हुआ है.

•    जीआई उत्पाद दूरदराज के क्षेत्रों में किसानों, बुनकरों शिल्पों और कलाकारों की आय को बढ़ाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा सकते हैं.

•    ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हमारे कलाकारों के पास बेहतरीन हुनर, विशेष कौशल और पारंपरिक पद्धतियों और विधियों का ज्ञान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है और इसे सहेज कर रखने तथा बढ़ावा देने की आवश्यकता है

Wednesday, December 12, 2018

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं माता सीता के विवाह पंचमी समारोह के लिए दुल्हन की तरह सज गया जनकपुरधाम, अयोध्या से आएगी बारात

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं देवी सीता के विवाह को समर्पित विवाह पंचमी को लेकर जनकपुर में तैयारी शुरू हो गई है। भारतीय श्रद्धालुओं के नेपाल के जनकपुर पहुंचने का सिलसिला जारी है। 12 दिसंबर को विवाह पंचमी है। नेपाल के जनकपुर स्थित विश्व प्रसिद्ध राम जानकी मंदिर में आयोजित ऐतिहासिक राम सीता विवाह महोत्सव में शिरकत करने के लिए विगत एक सप्ताह से देश के कोने-कोने से संत महात्मा जयनगर होते सड़क मार्ग से जनकपुर पहुंच रहे हैं। जैसे जैसे विवाह पंचमी का दिन नजदीक आ रहा है वैसे-वैसे जनकपुर जाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। जनकपुरी बिहार की सीमा से करीब 50km दूर है।01-33
12 दिसम्बर को विवाह पंचमी के अवसर पर भगवान राम एवं सीता के विवाह उत्सव को लेकर जानकी मंदिर सहित पूरे जनकपुर को सजाया एवं सवारा जा रहा है। हर साल की तरह अयोध्या से भगवान राम की बारात जनकपुर नेपाल जायेगी।
उम्मीद है कि 2018 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बाराती का हिस्सा होंगे.. पूरे रस्म रिवाज के साथ मां सीता एवं भगवान राम का विवाहउत्सव का समारोह पूरे 6 दिनों तक चलेगा।janakpur-mandir
जानकीमंदिर के महंत रामतपेशर दास ने बताया कि इस बार हर साल की तरह ही भगवान राम सीता का विवाहउत्सव की तैयारी  है। हमलोग अयोध्या से आने वाले भगवान राम के बरात का स्वागत धूमधाम से करेंगे हम लोग सराती बन कर पूरे रीती-रिवाज से विवाह उत्सव मनाएंगे।
इसीक्रम में 7 दिसम्बर को जनकपुर दर्शन, 8 को मां सीता का फुलवारी लीला का आयोजन, 9 को धनुष यझ, 10 को राममंदिर से जानकी मंदिर तिलक उत्सव मनाने 11 को मां सीता का मटकोर जानकी मंदिर से शोभा यात्रा गंगासागर पोखर तक 12 दिसम्बर को मां सीता का स्वयंबर बारबीघा मैदान में एवं पूरे रीती-रिवाज के साथ विवाह उत्सव मनाया जायेगा एवं 13 को भगवान का रामकनेवा एवं मयार्दी  भोज का अयोजन भी किया जायेगा..
आप सब भी अपने  परिवार के साथ आकर रामलला एवं माता सीता के इस मनभावन लीला का आनंद ले सकते हैं।।

Saturday, December 8, 2018

बिहारी समोसे..

वैसे तो समोसा पूरे भारत में ही प्रसिद्ध है..
लेकिन हमारे बिहार की बात ही कुछ अलग है..
हम इसे  प्रमुख रूप से सिंघाड़ा बोलते हैं या फिर जो लोग थोड़ा दिल्ली या टियर 2 सिटी रह कर आते है वो समोसा बोलते है..
पेश है इन्ही मे से एक हमारे भोजपुर क्षेत्र का मशहूर सिंघाड़ा..
अपने मसाले में आलू के साथ थोड़ी पनीर थोड़ा हरा मटर थोड़ा चिनीयाबादाम के मिक्सचर का अनोखा स्वाद ये सबको आकर्षित करता है...
ऊपर से धनिया की चटनी एवं थोड़ा सेव हो जाए तो बात ही निराली है...

Thursday, December 6, 2018

My Life..

I remember.. 
During my school days i used to sit on the 1st row having mentality that i am the best among all..
Maybe i was right maybe wrong. But at that time i always got positive result..

Now i am 22years old and sometimes I thought that why i lost that kind of mindset which i had in past.. Maybe that's why I am falling???
Don't know what going on with me and what is gonna happen next...

Wednesday, December 5, 2018

बाबू वीर कुँवर सिंह का किला ,, जगदीशपुर

बाबू वीर कुंवर सिंह (1777-26 अप्रैल 1858) भारत के  एक बहादुर योद्धा थे , जिनका जन्म जगदीशपुर(भोजपुर) में  हुआ था। वह राजपूतों के उज्जैनिया वंश से थे , जिन्होंने भोजपुर क्षेत्र में डुमराँव  और जगदीशपुर की जमींदार संपत्ति पर शासन किया था।23622422_1921690241425564_1730056157113838019_n
वीर कुँवर सिंह  एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्होंने 1857 की क्रांति में अपना भरपूर योगदान दिया था।..वे ऐसे योद्धा थे जिन्होंने 80 वर्ष की आयु होने के बावजूद अपने देश के लिए अपना सबकुछ झोंक दिया था..
जगदीशपुर का किला कुंवर सिंह का पैतृक किला था जिनमे वो वृद्ध होने के बावजूद देशहित के किये जरुरी सारे  बैठक एवं फैसले लेते थे। .उनकी जन्मतिथि को आज भी 23 अप्रैल को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। .
हालांकि  राष्ट्र की ओर उनकी बहादुरी, निःस्वार्थता और भक्ति के कई उदाहरण हैं, लेकिन सबसे लोकप्रिय घटना  का उल्लेख नीचे दिया गया है।
विद्रोह के दौरान, उनकी सेना को गंगा नदी पार करना पड़ा। डगलस की सेना ने उनके सेना की  नाव पर गोली चलाना शुरू कर दिया। कुंवर सिंह ने महसूस  किया कि उनका बांया हाथ बेकार हो गया है। और बुलेट शॉट के कारण संक्रमण का खतरा था। उन्होंने अपनी तलवार को खींचा और कोहनी के पास अपने बाएं हाथ काट दिया और देवी गंगा को चढ़ा दिया । कुंवर सिंह ने अपने पूर्वजों के गांव को छोड़ दिया और दिसंबर 1857 में लखनऊ पहुंचे। मार्च 1858 में उन्होंने आजमगढ़ पर कब्जा कर लिया।1024px-koor_sing_the_rebel_of_arrah_and_his_attendants
वर्तमान में इस किले को वीर कुंवर सिंह के स्मारक के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है जहा उनके जीवन से जुडी तमाम चीजों की झलक दिखाई जाती है। आज भी करीब 200 से 300 लोग रोजाना इस ऐतिहासिक किले को देखने एवं उनकी यादों को ताज़ा करने आते हैं।