Sunday, October 27, 2019

सुनहरी यादें बचपन की और दीवाली

आज दीपावली है.
मेरे लिए दीपावली का मतलब बस पटाखा ही होता था..
नाम सुनते ही करंट सा लग जाती थी पूरे शरीर मे क्यूंकि जब बच्चे थे तो पटाकों से बहुत प्यार था अभी भी है लेकिन अब वो उल्लास नहीं रहा..
याद है 10दिन पहले से ही जिद करते थे अभय चचा से ही पटाखा ला दीजिए ना तब कही जाकर 2 से 3 दिन पहले वो लाकर देते थे
उसके बाद ही तो असली दिवाली को फील आना शुरू हो जाती थी..
पढ़ने के बहाने पटाखों को धूप मे टनकाते थे दो दिन तक क्योंकि सुनते थे इससे अवाज ज्यादा करेगा पटाखा..
छोटा मोटा दुकान ही लग जाता था मेरे घर क्यूंकि ये तो है कि अंकल काफी सारा ही ले आते थे लगता है उन्हे भी शौक रहा होगा जिसे वो हमलोग के माध्यम से पूरा करते थे.
फिर आता था धनतेरस तो fridge( उस समय बहुत बड़ी चीज़ थी ये) और बड़े बड़े समान थोड़े हाई क्लास लोगों के लिए होते हैं हम लोग जरूरत का समान लेते थे जैसे पापा बाल्टी ले आते थे, चाचा टेंट हाउस का बर्तन वगैरह और मम्मी पूजा का दिया वगैरह लेती थी..
फिर छोटी दिवाली तो नहीं लेकिन हमलोगों का पटाखा चलाना उसी दिन से शुरू हो जाता था. हमारे घर मे इस दिन जम का दिया भी जलाया जाता है और मेरे खयाल से बिहार के अभी भी सब जगह है ये...
फिर तो आती थी सबसे प्यारी दिवाली.
पटाखों को एक आखिरी बार टनकने के लिए छोड़ते थे और लग जाते थे घर का काम मे जैसे कल से पानी भरना, बेलपतर दूभड़ी वगैरह लाना, दिया बत्ती को साफ करना मे और सनसनाठी का हुक्का पाती बनाना मे..
यही सब करने मे शाम हो जाती थी फिर हुक्का पाती के बाद ही पटाखा छोड़ सकते थे इसलिए बाबा को बोलते थे जल्दी करने और बाबा दादी को क्यूंकि दादी थोड़ा धीरे करती हैं सब काम..
फिर भी जैसे आपा धापी मे लक्ष्मी घोर दारीदर बाहर के बाद दादी चूमाती थी हमलोग को.. ये सब करने के बाद आते थे सबके यहां से प्रणाम करके तब आजादी मिलती थी originall दिवाली का जिसका की वेट करते थे इतना दिन से..
जी भर कर पटाके छुड़ाते थे
पहले जब अंकु सोमी छोटा था तो चिक्कू दी निक्कू दी के साथ.
और उसके बाद अंकु सोमी के साथ तो अभी तक मस्ती करते हैं..
हालाकि अब वक्त बदल गया है ये लगातार दूसरा साल है कि दिवाली पर घर नहीं गया हूँ..
जिम्मेदारी ज्यादा हो गयी है आज बैठे बैठे सारी बातें याद आ रही हैं..
काश घर पर होता तो वो सब दुबारा करता..
ख़ैर
आप सबको दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं..
उम्मीद करता हूं इस लेख से शायद आप भी अपना बचपन रिलेट करेंगे..
~ अमितेश

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